Hindi Poetry

एक लफ्ज़ में लिपटी हुई मेरी सांस
वोह छन से बिखरे बाल
कुछ आधी बोतल सी सियाही
और मेरे जिस्म से निकलती हुई जान

टुकड़ो में बसी जो यह कसम है
कैसे यह ज़िन्दगी के नियम है
कुछ में कहूँ कुछ मेरी परछाई
आ मिल बैठे हम करे एक सुनवाई

इस आकार पर मत जाना यह धोकेबाज़ होते हैं
इस हवा में मत घुलना यह कहीं और कि माटी है
जो जुड़ सके तोह मेरी

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